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ब्यक्ति बिशेष

संन्यास से सियासत तक का सफर

Lucknow (TV News India)

उत्तराखंड का एक होनहार छात्र जिसने युवावस्था में राजनीती में रखा कदम और बन गए एक राज्य के प्रशिद्ध मुख्यमंत्री लेकिन ये सफर उतना भी आसान नहीं था इनके लिए तो जानते है एक ऐसे ही राजनेता के बारे मे…

अजय सिंह बिष्ट का जन्म 5 जून 1972 को पिचूर गाँव, यमकेश्वर तहसील पौढी गडवाल उत्तराखंड में एक राजपूत परिवार में हुवा था। इनके पिता का नाम आनंद सिंह बिष्ट और माता का नाम सावित्री देवी है। 20 अप्रैल 2020 को उनके पिता आनन्द सिंह बिष्ट की मृत्यु हो गई। अपनी माता-पिता के सात बच्चों में तीन बड़ी बहनों व एक बड़े भाई के बाद ये पांचवें थे एवं इनसे और दो छोटे भाई हैं। अजय सिंह बिष्ट की प्राथमिक शिक्षा गजा गाँव के स्कूल से हुई और दसवीं कक्षा भी इन्हों ने यही से की । इसके बाद सन 1989 मे बारवी कक्षा ऋषिकेश के भरत इंटर मंदिर कॉलेज से की । गढ़वाल एच.एन.बी विश्वविद्यालय से इन्होने science मे स्नातक की।  जब स्नातक कर रहे थे तभी ये अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भी जुड़ गए ।

90 के दशक में राममंदिर आंदोलन के दौरान ही अजय सिंह की मुलाकात गोरखनाथ मंदिर के महंत अवैद्यनाथ से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक कार्यक्रम हुई. इसके कुछ दिनों बाद अपने माता-पिता को बिना बताए गोरखपुर जा पहुंचे और जहां संन्यास धारण करने का निश्चय लेते हुए गुरु दीक्षा ले ली. महंत अवैद्यनाथ भी उत्तराखंड के रहने वाले थे. जिन्होंने अजय सिंह बिष्ट को योगी आदित्यनाथ बनाने का काम किया. गोरखनाथ मंदिर के महंत की गद्दी का उत्तराधिकारी बनाने के चार साल बाद ही महंत अवैद्यनाथ ने योगी आदित्यनाथ को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी बना दिया. महंत अवैधनाथ जी की म्रत्यु के बाद योगी जी को गोरखनाथ मन्दिर का महंत बना दिया गया।

इनका राजनीती का सफर भी बड़ा ही दिलचस्प रहा  योगी आदित्यनाथ के गुरु अवैद्यनाथ ने सन 1998 में राजनीति से संन्यास लिया और  इनको अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. यहीं से योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पारी शुरू हुई. यह वही दौर था, जब गोरखपुर की राजनीति पर दो बाहुबली नेताओं हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही की पकड़ कमज़ोर हो रही थी. युवाओं ख़ासकर गोरखपुर विश्वविद्यालय के सवर्ण छात्र नेताओं को इस ‘एंग्री यंग मैन’ में हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे महंत दिग्विजयनाथ की ‘छवि’ दिखी और वो उनके साथ जुड़ते गए.1998 में गोरखपुर से 12वीं लोकसभा का चुनाव जीतकर योगी आदित्यनाथ संसद पहुंचे तो वह सबसे कम उम्र के सांसद थे, वो 26 साल की उम्र में पहली बार सांसद बने.गोरखपुर की राजनीति में एक ‘एंग्री यंग मैन’ की यह धमाकेदार एंट्री थी.

सियासत में कदम रखने के बाद योगी आदित्यनाथ की छवि एक कठोर हिंदुत्ववादी नेता के तौर पर उभरी. सांसद रहते हुए गोरखपुर जिले को अपने नियम अनुसार चलाने और त्वरित फैसलों से सबको चकित किया. इसी के चलते योगी के सियासी दुर्ग को न तो मुलायम सिंह का समाजवादी भेद पाया और न ही मायावती की सोशल इंजीनियरिंग काम आई. गोरखपुर में योगी का हिंदुत्व कार्ड ही हावी रहा. हिंदू युवा वाहिनी संगठन हिन्दू युवाओं का सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी समूह है. ये संगठन हमेशा किसी न किसी विवाद में उलझा रहा. इस संगठन पर 2005 में मऊ में हुए दंगे का आरोप भी लगा था. यह दंगा भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक कृष्णानंदा राय की हत्या के आरोपी मुख़्तार अंसारी को लेकर हुआ था.7 सितम्बर 2008 को सांसद योगी आदित्यनाथ पर आजमगढ़ में जानलेवा हिंसक हमला हुआ था। इस हमले में वे बाल-बाल बचे थे। यह हमला इतना बड़ा था की सौ से अधिक वाहनों को हमलावरों ने घेर लिया और लोगों को लहुलुहान कर दिया था ।

योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी खासियतों में एक है कि वह जनता से सीधा संवाद करने में विश्वास रखते हैं. 2017 में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला तो सीएम के लिए कई चेहरे दावेदार थे, लेकिन बाजी योगी आदित्यनाथ के हाथ लगी. योगी आदित्यनाथ ने 19 मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। शपथ समारोह लखनऊ के कांशीराम स्मृति उपवन में हुआ। इनके साथ दो उप-मुख्यमंत्री भी बनाये गए। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में पहली बार दो उप-मुख्यमंत्री बने। योगी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने फैसलों से अपनी राजनीतिक इच्छा को जाहिर कर दिया. हालांकि प्रदेश में हुए एनकाउंटरों के कारण विपक्ष ने उंगलियां भी उठाईं, लेकिन कानून-व्यवस्था पर सख्त योगी पर इसका खास प्रभाव नहीं हुआ. इस समय हमारा देश कोरोना के संकट से गुजर रहा है ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करते हुए कड़े फैसले लिए जिसकी वजह से उनकी लोकप्रियता में और भी इजाफा हुआ है.

Report : Ashutosh Singh

 

 

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