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वक्त की मार और गुमनामी में ‘किंगमेकर’

एक ज़माना था कि बिहार में एक जुमला गूंजता था ” जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू” हिन्दुस्तान की राजनीति के अलबेले नेता लालू यादव, चार दशक की सियासत में शून्य से आसमान तक नापने वाले लालू यादव, जिनका अंदाज सबसे अलग है और बातें सबसे जुदा। अपनी वाकपटुता और गवई अंदाज से लोगों को हंसाने में माहिर लालू जिनकी बातें और जुमले सुनकर या उनके बोलने के अंदाज पर लोग अपनी मुस्कान ना रोक पाएं। ठेठ देसी अंदाज में जनता के साथ सीधा संवाद करने वाले देश के एकलौते ऐसे राजनेता लालू, जो अपनी सभाओं में मजाकिया बातें करते, चुटकुले सुनाकर लोगों को हंसाते, अपनी बातों की पोटली से निकालकर ऐसे ऐसे जुमलों के तीर बरसाते, जिन्हें सुनकर लोग तालियां बजाने पर मजबूर हो जाते। लालू यादव का चिर परिचित अंदाज देश-दुनिया में मशहूर है। लालू यादव ऐसे नेता हैं जिन्होंने बिहार से लेकर केंद्र तक में सरकारें बनवाने में अहम भूमिका निभाई है। बिहार की राजनीति में लालू यादव का जन्म और उनका अंदाज अंदाज ए बयां और आम लोगों के साथ जोड़ने की उनकी विधा का अपना एक इतिहास रहा है।

बिहार के गोपालगंज में पड़ने वाले फुलवारिया गांव दूध बेचने वाले कुंदन राय के यहां आज़ादी के अगले साल जून महीने की 11 तारीख को दूसरे बेटे ने जन्म लिया जिसका नाम था लालू। नाम लालू कैसे पड़ा इसकी भी कहानी बड़ी दिलचस्प है। बचपन में लालू गोरे, गोल-मटोल और भाइयों में सबसे छोटे थे। इसलिए पिता कुंदन राज ने इनका नाम लालू नाम रख दिया। बचपन में लालू ने अपनी मां मरिछिया देवी के साथ घर-घर जाकर दूध बांटा. गांव में ज़्यादा कुछ था नहीं, तो 1966 में पढ़ने शहर गए, अपने बड़े भैया के पास। भैया पटना के बिहार वेटरनरी कॉलेज में चपरासी की नौकरी करते थ।  कॉलेज के ही सर्वेंट क्वॉर्टर में रहते थे. यहीं से लालू बस पकड़कर बीए की पढ़ाई करने बिहार नेशनल कॉलेज जाते थे। बीएन कॉलेज से लालू ने छात्र राजनीति में कदम रखा और  मंच पर चढ़कर भाषण देने लगे. मंच उनके लिए नया नहीं था बचपन में लालू ने मंच पर ‘नटुआ’ बनकर खूब धमाल मचाया था. नटुआ माने वो लड़का जो लड़की के कपड़े पहनकर नाचता-गाता है. तो लालू को लोगों से बात करने और मोहने का तरीका आता था और लोगों में पैठ बनाने के लिए उनकी यही पूंजी उनके सबसे ज़्यादा काम आई. छात्र उन्हें सुनना पसंद करते थे. अगले साल ही लालू पटना यूनिवर्सिटी की स्टुडेंट यूनियन के जनरल सेक्रेटरी बन गए।

1970 में लालू का ग्रेजुएशन पूरा हुआ लेकिन लालू स्टुडेंट यूनियन के अध्यक्ष पद का चुनाव हार गए. लेकिन लालू ने व्यावहारिक फैसला लिया. भैया के दफ्तर में ही डेली वेज बेसिस पर चपरासी की नौकरी कर ली.तीन साल बाद लालू ने दोबारा पढ़ाई का रुख किया. पटना यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई के लिए दाखिला ले लिया बतौर यूनिवर्सिटी के छात्र वो अब दोबारा छात्रसंघ का चुनाव लड़ सकते थे. 1973 में लालू प्रसाद यादव पटना यूनिवर्सिटी की स्टुडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट बन गए. लालू बिल्कुल सही समय पर छात्र राजनीति में वापस आए थे. अगले ही साल जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन की घोषणा कर दी। 1970 में शुरू हुआ यह आंदोलन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार और उनकी ओर से लगाए गए आपातकाल के खिलाफ शुरू हुआ था। लालू इस आंदोलन में शामिल हो गए. छात्र राजनीति में पकड़ रखने वाले लालू को जेपी की पसंद बनने में ज़्यादा वक्त नहीं लगा. और इसी के चलते वो आपातकाल की घोषणा के बाद पुलिस के राडार पर आ गए। सन् 1975 में  लालू प्रसाद यादव को गिरफ्तार किया गया और 77 तक वे जेल में बंद रहे.मीसा कानून के तहत बंद लालू यादव जेल से रिहा हो गए।

आपातकाल के बाद 1977 में लोकसभा चुनाव हुआ, लालू को छपरा से टिकट मिला. कांग्रेस के खिलाफ माहौल बना हुआ था और लालू जीत गए. 29 साल की उम्र में संसद पहुंचने वाले लालू उस वक्त तक भारत के सबसे युवा सांसद थे. पार्टी के अंदर भी उनका कद बढ़ता रहा. जेपी ने लालू को स्टुडेंट्स एक्शन कमिटी का मेंबर बना दिया। इसी कमिटी को बिहार विधानसभा चुनाव के लिए टिकट तय करने थे. बड़े-बड़े नेता टिकट के लिए पटना वेटरनरी कॉलेज के सर्वेंट क्वॉर्टर के बाहर लाइन लगाने लगे। 1980 में हुए चुनाव में लालू की सांसदी चली गई तो उन्होंने इसी साल हुए विधानसभा चुनावों में सोनपुर के लिए लोक दल के टिकट पर विधायकी का पर्चा भर दिया और जीत गए. 1985 में लालू ने फिर विधानसभा का चुनाव जीता. फरवरी 1988 में कर्पूरी ठाकुर का अचानक देहांत हो गया और विपक्ष का नेता लालू प्रसाद यादव को बना दिया गया। मार्च 1990 के बिहार विधानसभा चुनावों में जनता दल के जीत जाने की स्थिति में लालू अपने मुख्यमंत्री बनने की संभावना को लेकर निश्चित नहीं थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह लालू यादव का समर्थन नहीं कर रहे थे। वे एक दलित नेता को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने के इच्छुक थे। बिहार की सियासत में अलग ही खेल चल रहा था। लेकिन लालू तो जैसे ठान ही चुके थे कि आलाकमान का फैसला या फरमान जो हो सीएम की कुर्सी पर तो विडाउट एनी इफ और बट उन्हें ही बैठना है।

लालू एक ऐसा चुनाव करवाने में लग गए जो उन्हें उसी प्रकार से जीतना था, जिस प्रकार वे आगे कई चुनाव जीतनेवाले थे। अपने खिलाफ जाने वाले वोटों का विभाजन करके। उन्होंने बलिया के दबंग नेता चंद्रशेखर से लगभग एक छोटे बच्चे की तरह शिकायत भी की और मदद की गुहार लगाई।  उन्होंने कहा कि यह राजा हमारी संभावनाओं को खत्म करने पर तुला हुआ है। ‘‘कृपया हमारी मदद कीजिए, वरना वीपी सिंह अपने आदमी को बिहार का मुख्यमंत्री बना देंगे। चंद्रशेखर, बिना शक, वीपी सिंह से इतनी नफरत करते थे कि उनकी किसी भी इच्छा का विरोध कर सकते थे। उन्होंने लालू यादव को आश्वासन दिया कि वे इस मामले में कुछ करेंगे। जिसके बाद बिहार की सियासत में एक नया मोड़ आया। जिस दिन नेता के चुनाव के लिए जनता दल के विधायकों की बैठक थी, वहां अचानक मुख्यमंत्री पद के दो के बजाय तीन दावेदार प्रकट हो गए -रघुनाथ झा चंद्रशेखर के उम्मीदवार के रूप में दौड़ में शामिल हो गए थे। निस्संदेह वे मुख्यमंत्री पद के गंभीर उम्मीदवार नहीं थे। लेकिन वे वहां सिर्फ विधायक दल के वोटों का विभाजन करने आए थे, ताकि लालू यादव को फायदा हो जाए। झा को अपने मिशन में कामयाबी भी मिली। वोट जाति के आधार पर विभाजित हो गए, हरिजनों ने रामसुंदर दास के लिए वोट किया, सवर्णों ने रघुनाथ झा का साथ दिया। नतीजा लालू मामूली अंतर से जीत गए। 10 मार्च 1990, पटना का गांधी मैदान, 5000 की भीड़ और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की प्रतिमा के ठीक नीचे सीएम की शपथ। यह पहला ऐसा मौका था जब राजभवन के प्रसार से बाहर कोई मुख्यमंत्री शपथ ले रहा था। अब तक बिहार में सत्ता ज़्यादातर ब्राह्मण, राजपूत और भूमिहार समाज के पास रही थी।

शुरुआती दिनों में लालू के काम करने का तरीका वो था कि अनिल कपूर की ‘नायक’ की स्क्रिप्ट फीकी लगे. लालू मुख्यमंत्री आवास नहीं गए.  लालू सर्वेंट क्वॉर्टर बुलाकर वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को घुट्टी पिलाते, शराब के ठेकों पर खुद छापा मारकर सरेआम उनके लाइसेंस कैंसिल करते. लोगों को लगा कि वो एक सपना जी रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के संकल्प के साथ आडवाणी रथ यात्रा लेकर गुजरात के सोमनाथ से बिहार के समस्तीपुर पहुंचे थे। आडवाणी के रथ को बिहार से होते हुए सात दिन बाद 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचना था।लालकृष्ण आडवाणी एक तूफान की तरह अपना रथ लेकर पूरा देश घूमे थे. लेकिन लालू ने उन्हें बिहार में रोक दिया. आडवाणी को लालू ने गिरफ्तार करवाया. इससे लालू एक सेक्युलर चेहरे के रूप में स्थापित हो गए।

लालू के पहले कार्यकाल की सारी उपलब्धियां कहीं गुम होने लगीं जब लालू के दूसरे कार्यकाल के दौरान बिहार में ‘जंगलराज’ की शुरुआत हुई. और इसके लिए सीधा दोष लालू को दिया जाने लगा। लालू ने जो छवि गढ़ी थी वो पूरी तरह सच नहीं थी. एक विधायक के तौर पर उन्होंने ऐसे सभी काम किए जो बिहार के विधायकों के लिए सामान्य माने जाते थे मसलन ट्रांसफर वगैरह. इतने को लोग भ्रष्टाचार कहना तब तक बंद कर चुके थे. लेकिन 1996 की जनवरी में पश्चिम सिंहभूम में एनिमल हसबैंडरी विभाग के दफ्तर पर एक रेड पड़ी. इसमें जब्त हुए दस्तावेज़ सार्वजनिक हो गए. भूसे के बदले बिहार सरकार के खज़ाने से अनाप-शनाप बिल पास करवाए जा रहे थे इसे चारा घोटाला कहा गया और  इल्ज़ाम लगा जगन्नाथ मिश्र और लालू प्रसाद यादव पर। शोर मचा तो सीबीआई लालू की गिरफ्तारी के लिए वॉरेंट ले आई. मजबूरी में 1997 की जुलाई में लालू को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा. छात्र आंदोलन के दौरान कई दफे ठसक से जेल जा चुके लालू पहली बार एक आरोपी के तौर पर बेउर जेल गए. लेकिन जेल जाने भर से लालू का तिलिस्म खत्म होने वाला नहीं था. लालू ने एक बार फिर सबको चौंका दिया. अपनी जगह सीएम बनाया गया राबड़ी देवी को. राबड़ी देवी को इससे पहले कभी सार्वजनिक जीवन में नहीं देखा गया था. लालू ने जेल से बिहार सरकार चलाई.

इसी साल लालू ने जनता दल तोड़कर अपनी अलग पार्टी राष्ट्रीय जनता दल बनाई। चारा घोटाला में लालू बुरी तरह फंस गए थे. बावजूद इसके आरजेडी अगला विधानसभा चुनाव जीती. मुख्यमंत्री राबड़ी ही रहीं. ये लालू की मज़बूती की निशानी थी लेकिन बिहार के लोग अब जंगलराज से तंग आने लगे थे. पत्रकार अपनी रपटों में बिहार को हिंदुस्तान का गटर कहने लगे। लालू का जादू बिहार से उतरने लगा था. चर्चा यही थी कि लालू चौथी बार बिहार नहीं जीतेंगे. हुआ भी ऐसा ही. 2005 के विधानसभा चुनाव में नतीजे किसी के पक्ष में नहीं गए. सीटें लालू की आरजेडी, नीतीश की जदयू और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी में बंट गईं. लालू के पास पासवान के साथ सरकार बनाने का मौका था. लेकिन पासवान अड़ गए कि मुख्यमंत्री कोई मुस्लिम चेहरा होगा लेकिन  लालू ने समझौता नहीं किया।  चुनाव दोबारा हुए. नीतीश ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और जीत गए. लालू की गलती ने उन्हें अगले 10 साल के लिए सत्ता से दूर कर दिया।

2005 में अपना किला ढहने से ऐन पहले तक भी लालू में इतना दम बाकी था कि 2004 में सांसदी का पर्चा छपरा और मधेपुरा से भरकर भाजपा के राजीव प्रताप रूडी और जदयू के शरद यादव को हरा दें. लालू के पास कुल 22 विधायक थे और इनके बल पर वो यूपीए में रेलमंत्री का मलाईदार पद पा गए और रेलमंत्री के तौर पर लालू ने गज़ब का इमेज मेकओवर किय।  भारतीय रेल की जंग खाई हुई मशीन जैसे तेल पाकर रवां हो गईं और सरपट चलने लगीं. मेहनत रही जिसकी भी हो, क्रेडिट हमेशा लालू को मिला. देसी भाषा में बात करने वाले का भौकाल किसी फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलने वाले मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ से ज़्यादा हो गया. लेकिन यहां तक आते-आते लालू काफी बदल गए थे. बिहार के सीएम रहते गइया का दूध दुहते हुए पत्रकारों से मिलने वाले लालू अब हाई-फाई ‘नेता’ बन गए थे।

2005 में लालू ने जिस रफ्तार से साख खोनी शुरू की, उससे 2009 तक उनका असर इतना कम हो गया कि इस साल हुए लोकसभा चुनावों में राजद के सिर्फ दो सांसद दिल्ली पहुंचे. कांग्रेस ने भी लालू में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. रेलमंत्री रहते हुए लालू सोनिया गांधी और मनमोहन के करीब होते गए थे, लेकिन चारा घोटाले के भूत ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. अक्टूबर 2013 में लालू प्रसाद यादव को सीबीआई की विशेष अदालत ने पांच साल की सज़ा सुना दी. 25 लाख का जुर्माना भी लगा दिया. लालू की सांसदी गई और छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी बैन लग गया।  2015 में बिहार में विधानसभा चुनाव आते तक नीतीश बिहार के पोस्टर बॉय बन चुके थे. भाजपा ने इसे समझने में भूल कर दी और नीतीश से अलग होकर चुनाव लड़ा. नतीजे आए तो भाजपा भी दंग रह गई और नीतीश भी. विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी थी. लालू के पास ये सत्ता में लौटने का मौका था. इस बार उन्होंने 2005 वाली गलती नहीं की और नीतीश को मुख्यमंत्री बन जाने दिया। लालू के बेटे तेजस्वी यादव को डिप्टी सीएम बनाया गया ये बिहार की राजनीति में लालू का पुनर्जन्म था।

इस बीच लगातार उन पर आय से अधिक संपत्ति गांठने का इल्ज़ाम लगता रहा. लालू इनकार करते रहे और साबित भी कुछ नहीं हुआ, लेकिन उनकी और उनके परिवार की ‘बरकत’ किसी से छुपी नहीं है. इस बात में कम ही संशय है कि पटना की जिस प्राइम प्रॉपर्टी को लालू ने अब जाकर स्वीकारा है, वो उनकी ‘तरक्की’ का अकेला नमूना नहीं है। पिछले कई महीनों से लगातार लालू के परिवार और सहयोगियों के यहां छापे पड़े  है। केंद्र में एक ऐसी सरकार है जो उन्हें बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ने वाली महागठबंधन में उनके साथी नीतीश उन्हें बचाने में कितनी रुचि लेंगे, कहना मुश्किल है।

बहरहाल, पटना में दानापुर-खगौल रोड नामक एक सड़क है। शताब्दी स्मारक पार्क के पास से लगी इस सड़क से दानापुर-पाटलिपुत्र रोड की एक और सड़क शुरू होती है। इसी के चलते इस इलाके का नाम सगुण मोड़ पड़ गया है। सड़कों पर आने वाले मोड़ अप्रत्याशित होने का अंदेशा लेकर आते हैं। बिहार की राजनीति के किंगमेकर कहे जाने वाले लालू के साथ यही हुआ है। उनका राजनैतिक करियर सगुण मोड़ पर आकर रुक गया है यहां से आगे कुछ तय नहीं।

Report : Ashutosh Singh

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