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चीन की आदत और फितरत में है फरेब और धोखा

गलवान घाटी में भारत और चीनी सैनिकों के बीच पिछले एक माह से चल रहे टकराव ने हिंसक रूप ले लिया जिसमे भारतीय सेना के मुताबिक, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ झड़प में भारत के कमांडिंग अधिकारी (कर्नल) समेत 20 जवान शहीद हो गए। वहीं समाचार एजेंसी एएनआई ने दावा किया कि जवाबी कार्रवाई में 43 चीनी सैनिक मारे गए और कई गंभीर रूप से घायल हुए हैं। सेना ने बयान में कहा कि भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच गलवान इलाके में 15-16 जून की रात झड़प हुई थी। इसमें दोनों ओर के सैनिक हताहत हुए हैं। झड़प जवानों के अपनी-अपनी जगहों से पीछे हटने के दौरान हुई।

दरअसल भारत और चीन के बीच अब तक सीमांकन नहीं हुआ है. यथास्थिति बनाए रखने के लिए लाइन ऑफ़ ऐक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी तय की गई है लेकिन गलवान समेत कुछ 15 ऐसे बिंदु हैं, जहां एलएसी को लेकर सहमति नहीं है।  इन विवादित इलाक़ों में दोनों देशों के सैनिक पेट्रोलिंग करते रहे हैं और इस पेट्रोलिंग के तय प्रोटोकॉल हैं। ये सीमा विवाद पहली बार नहीं हुआ है ये हमें सन1962 की याद दिलाता है। ये वो साल है जब दोस्ती के नाम पर चीन ने पीठ पर घोंपा था दगाबाजी का खंजर। 1962 में चीन से मिली शिकस्त की टीस आज भी भारतीयों के दिल में बरकरार है, पर इतिहास गवाह है कि इस घटना के पांच साल बाद 1967 में हमारे जांबाज सैनिकों ने चीन को जो सबक सीखाया था, उसे वह कभी भुला नहीं पाएगा।  यह सब भी उन महत्वपूर्ण कारणों में से एक है जो चीन को भारत के खिलाफ किसी दुस्साहस से रोकता है. 1967 को ऐसे साल के तौर पर याद किया जाता रहेगा जब हमारे सैनिकों ने चीनी दुस्साहस का मुंहतोड़ जवाब देते हुए सैकड़ों चीनी सैनिकों को न सिर्फ मार गिराया था, बल्कि भारी संख्या में उनके बंकरों को ध्वस्त कर दिया था. रणनीतिक स्थिति वाले नाथू ला दर्रे में हुई उस भीडंत की कहानी हमारे सैनिकों की जांबाजी की मिसाल है।

भारत के इतिहास के पन्नो में दर्ज एक भयानक युद्ध जो भारत चीन के बीच 1962 में हुआ था। इस युद्ध में भारत को हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन यह युद्ध हमारे देश को कूटनीति का मतलब सिखा गया था जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु समझ नही पाये थे।  उन्होंने खुद यह बात मानी थी कि वे इसे महज एक सामान्य झगड़ा ही समझ रहे थे, जो बातचीत के जरिये समाप्त हो सकता था।  उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत अपने ही बनाये दायरे में वास्तविक्ता से दूर था. कई हद तक हमारे सामने साक्ष्य मौजूद थे पर हमने अनदेखा किया।  इस युद्ध में हार के पीछे तात्कालिक सरकार को कठघड़े में खड़ा किया गया, स्वयं राष्ट्रपति श्री राधाकृष्णन ने ये आरोप सरकार पर लगाया की यह युद्ध लापरवाही का परिणाम था।

सरदार वल्लभभाई पटेल को हमेशा से चीन की नियत पर शक था वे उसे मुँह पर कुछ पीठ पीछे कुछ, ऐसा संबोधित करते थे। उन्होंने खुद इस बात का जिक्र पंडित जवाहर लाल नेहरू से किया, लेकिन नेहरू जी ने इस बात को भी अनदेखा कर दिया शायद इन्ही लापरवाही के चलते चीन ने भारत पर आक्रमण किया और भारत को हार का मुख देखना पड़ा, लेकिन चीन के इस कदम से उसकी अंतराष्ट्रीय छवि पर गहरा आघात पहुँचा था।

चीन ने भारत पर 20 अक्टूबर 1962 को आक्रमण किया जो की  21 नवंबर तक चला। भारत को इस युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था  20 अक्टूबर का दिन हर साल National Solidarity Day (China attacked India on that day) के तौर पर याद रखा जाता हैं हालाँकि चीन ने 1959 से ही भारत पर छोटे-छोटे आक्रमण शुरू कर दिए थे सीमा पर तनातनी का माहौल गहराने लगा था शायद इसके पीछे का करण था, कि उस वक्त भारत ने दलाई लामा को शरण दी थी और ये बात चीन को हजम नहीं हुई और उसने कहीं न कहीं युद्ध का मन बना लिया था।

14,200 फीट पर स्थित नाथु ला दर्रा तिब्बत-सिक्किम सीमा पर है, जिससे होकर पुराना गैंगटोक-यातुंग-ल्हासा व्यापार मार्ग गुजरता है यूं तो सिक्किम-तिब्बत सीमा निर्धारण स्पष्ट ढंग से किया जा चुका है, पर चीन ने कभी भी सिक्किम को भारत का हिस्सा नहीं माना। 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान चीन ने भारत को नाथु ला एवं जेलेप ला दर्रे खाली करने को कहा।  भारत के 17 माउंटेन डिविजन ने जेलेप ला को तो खाली कर दिया, लेकिन नाथु ला पर भारत का आधिपत्य जारी रहा आज भी जेलेप ला चीन के कब्जे में है।

नाथू ला दोनों देशों के बीच टकराव का बिंदु बन गया 1967 के टकराव के दौरान भारत की 2 ग्रेनेडियर्स बटालियन के जिम्मे नाथु ला की सुरक्षा थी. इस बटालियन की कमान तब ल़े कर्नल राय सिंह के हाथों में थी. इस बटालियन की कमान तब ब्रिगेडियर एम़ एम़ एस़ बक्शी, एमवीसी, की कमान वाले माउंटेन बिग्रेड के अधीन थी। नाथु ला दर्रे पर सैन्य गश्त के दौरान दोनों देशों के सैनिकों के बीच अक्सर जुबानी जंग का माहौल बना रहता था जो शीघ्र ही धक्कामुक्की में तब्दील हो गया। 6 सितंबर, 1967 को धक्कामुक्की की एक घटना का संज्ञान लेते हुए भारतीय सेना ने तनाव दूर करने के लिए नाथु ला से लेकर सेबू ला तक के दर्रे के बीच में तार बिछाने का फैसला किया यह जिम्मा 70 फील्ड कंपनी ऑफ इंजीनियर्स एवं 18 राजपूत की एक टुकड़ी को सौंपा गया. जब बाड़बंदी शुरू हुई तो चीन के पॉलिटिकल कमीसार ने राय सिंह से फौरन यह काम रोकने को कहा. दोनों ओर से कहासुनी शुरू हुई और चीनी अधिकारी के साथ धक्कामुक्की से तनाव बढ़ गया. चीनी सैनिक तुरंत अपने बंकर में लौट गए और भारतीय इंजीनियरों ने तार डालना जारी रखा।

चंद मिनटों के अंदर चीनी सीमा से चीनियों ने मेडियम मशीन गनों से गोलियां बरसानी शुरू कीं भारतीय सैनिकों को शुरू में भारी नुकसान झेलना पड़ा, क्योंकि उन्हें चीन से ऐसे कदम का अंदेशा नहीं था. राय सिंह खुद जख्मी हो गए, वहीं दो जांबाज अधिकारियों 2 ग्रेनेडियर्स के कैप्टन डागर एवं 18 राजपूत के मेजर हरभजन सिंह के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों के एक छोटे दल ने चीनी सैनिकों का मुकाबला करने की भरपूर कोशिश की और इस प्रयास में दोनों अधिकारी शहीद हो गए।

इसके बाद भारत की ओर से जो जवाबी हमला हुआ उसने चीन का इरादा चकनाचूर कर दिया. सेबू ला एवं कैमल्स बैक से अपनी मजबूत रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाते हुए भारत ने जमकर आर्टिलरी पावर का प्रदर्शन किया। कई चीनी बंकर ध्वस्त हो गए और खुद चीनी आकलन के अनुसार भारतीय सैनिकों के हाथों उनके 400 से अधिक सैनिक मारे गए। भारत की ओर से लगातार तीन दिनों तक दिन-रात फायरिंग जारी रही चीन को सबक सिखाया जा चुका था।  रात में चीनी सैनिक अपने मारे गए साथियों की लाशें उठाकर ले गए और भारत पर सीमा का उल्लंघन करने का आरोप गढ़ा गया. 15 सितंबर को ले. ज. जगजीत अरोरा एवं ले. ज. सैम मानेकशॉ समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में शवों की अदला-बदली हुई।

1 अक्टूबर, 1967 को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने चाओ ला इलाके में फिर से भारत के सब्र की परीक्षा लेने का दुस्साहस किया, पर वहां मुस्तैद 7/11 गोरखा राइफल्स एवं 10 जैक राइफल्स नामक भारतीय बटालियनों ने इस दुस्साहस को नाकाम कर चीन को फिर से सबक सिखाया।  ये दोनों सबक चीन को आज तक सीमा पर गोली बरसाने से रोकते हैं तब से आज तक एक भी गोली सीमा पर नहीं चली है, भले ही दोनों देशों की फौज एक-दूसरे की आंखों में आंखें डालकर सीमा का गश्त लगाने में लगी रहती है।

चीन ने 1962 का युद्ध ऐसे समय पर छेड़ा था जब भारत उसपर विश्वास करने लगा था और दोस्ती के नए अध्याय लिखे जा रहे थे। इसी दौर हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी बुलंद हुआ था। लेकिन चीन की हरकत ने इस दोस्ती की पीठ पर दगाबाजी का छुरा घोंप दिया। 1962 की हार की बात है तो यह एक तरह की राजनीतिक पराजय थी, न कि सैन्य हार। भारत पंचशील के स्वर्णिम स्वप्न में खोकर जब हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे में खोया हुआ था, तभी 1962 की लड़ाई चीन द्वारा विश्वासघात के रूप में भारत को प्राप्त हुई परंतु चीन को 1962 के आगे के इतिहास को भी याद रखना चाहिए। इसी युद्ध की पृष्ठभूमि पर ही लता मंगेशकर ने देशभक्ति गीत  ‘ मेरे वतन के लोगों  गाया था।

भारत और चीन एशिया की दो महाशक्तियां मानी जातीं हैं। ग्‍लोबल फायर पावर रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 की रैकिंग में भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश है जिसके पास सबसे ताकतवर सेना है। आज का हिंदुस्तान सशक्त है वह जनता है की जिस तेजी से विकास की और कदम बढ़ा रहा है तो उसकी रास्ते में रोड़े भी कम नहीं है।  हिंदुस्तान को हर तरह की मुसीबतों से निपटने आता है वो हरतरह के पैतरों से बखूबी वाकिफ भी है इसलिए वो मुल्क जान ले की अगर भारत की तरफ जो भी आँखें उठेंगी उसे करारा जवाब मिलेगा…

 

उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता,

जिस मुल्क की सरहद की निगेबान है आंखे।।

एक कडवी सच्चाई यह भी है कि ये दोनों देश पूरे विश्व के 2 चमकते हुए सितारे हैं इन दोनों की अर्थव्यवस्था पर ही विश्व की अर्थव्यवस्था टिकी हुई है। इसलिए विश्व के अन्य विकसित देश इन दोनों देशों के बीच युद्ध की किसी भी संभावना को ख़त्म करने में कोई कसर नही छोड़ेंगे जो कि विश्व में शांति और विकास के लिए सबसे जरूरी है।

Report : Ashutosh Singh

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