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उचित सुविधा का अभाव झेलती ऑनलाइन शिक्षा

(TV News India) : दुनिया भर में लॉकडाउन के चलते सभी स्कूलों को भी बंद कर दिया गया है। इस समस्या का खासकर प्राइवेट स्कूलों ने डिजिटल माध्यम से बच्चों को शिक्षा देने का उपाय निकाला। जिसमें ऑनलाइन क्लासेस वाट्सएप ग्रुप बना कर बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। लेकिन इन माध्यमों में जो पठन सामग्री बनाई गयी है या भेजी जा रही है वो बच्चों को ध्यान में रखते हुये नहीं बनाई गयी है।

ज्यादातर स्कूल पुराने अपलोडेड वीडियो जगह-जगह से उठाकर बच्चों को शेयर कर रहे हैं। सामग्री पाठ्यक्रम अनुरूप न होने के कारण इसे समझने में बच्चों को परेशानी हो रही है। असल में स्कूल प्रबंधन चाह रहा है कि लॉकडाउन के दौरान बच्चे शिक्षा से विमुख न हों। वो नयी क्लास के हिसाब से अपना पाठयक्रम पढ़ें। ऑनलाइन पढ़ाई में कई व्यवाहारिक दिक्कतें भी हैं, लेकिन लॉकडाउन में जब स्कूल खोलना खतरे से खाली नहीं है, ऐसे में ऑनलाइन क्लास ही बड़ा सहारा है। ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान घर में बच्चों को स्क्रीन पर घंटों बैठना पड़ रहा है। बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान कई तरह की चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है।

वैसे तो देश के कई स्कूल ऑनलाइन पढ़ाई करवा रहे हैं। लेकिन समस्या तो उन ग्रामीण और ऐसे क्षेत्रों की है जहा बिना तैयारी के उठाए गए इस क़दम से देश में एक नई तरह की असमानता को जन्म दे दिया है. इस ऑनलाइन पढ़ाई में दूर-दराज के गांव में फंसे छात्र वंचित हो गये है और साथ ही शहरों के वो छात्र भी जिनके पास स्मार्टफोन या लैपटॉप नहीं है.तमाम स्कूल ऐसे भी हैं जो सुविधा सम्पन्न नहीं है, ऐसे में वो ऑनलाइन पढ़ाई करवा पाने में असमर्थ हैं। वैसे भी ऑनलाइन पढ़ाई के लिए बच्चों के पास भी तो मोबाइल और लैपटॉप की व्यवस्था होनी जरूरी है। जब भारत में केवल 24 फीसदी घरों तक ही इंटरनेट की उपलब्धता है तो ऑनलाइन शिक्षा की सार्थकता पर स्वयं सवाल उठ जाते हैं।ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा से वंचित छात्रों के अभिवावकों का चिंतित होना स्वाभाविक है।

केंद्र सरकार के साख्यिकी मंत्रालय के अधीन आने वाले नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के 2017-18 के सर्वे में यह तथ्य सामने आया कि भारत में केवल 24 फीसदी घरों में ही इंटरनेट की सुविधा है. ग्रामीण भारत की 66 फीसदी जनता में से केवल 15 फीसदी के घरों में ही इंटरनेट की सुविधा है और शहरी भारत में भी आंकड़ा 42 फीसदी घरों तक ही सीमित हो जाता है. अगर आंकड़े ये हैं तब ऑनलाइन पढ़ाई कैसे इन छात्रों तक पहुंचेगी?

ऑनलाइन क्लासेस के लिए एंड्रयाड फोन/कम्प्यूटर/टैबलेट, ब्राडबैंड कनेक्शन की जरूरत होती है। ज्यादातर ग्रामीण बच्चों के परिवार की आर्थिक स्थिति सही नहीं होती उसके चलते उनके पास डिजिटल क्लासेस के लिए आवश्यक उपकरण नहीं होते हैं जिसके कारण ये क्लास नहीं कर पा रहे जबकि इस समय इन बच्चों के क्लास के अन्य साथी ऑनलाइन क्लासेस के माध्यम से पढ़ाई कर रहे हैं। गिनने लायक परिवार ही ऐसे होगें जिनके पास ये उपकरण उपलब्ध होंगे।

एक बात जरूर है कि निजी शिक्षा संस्थान अभिभावकों पर दबाव बनाकर इसका शुल्क वसूल कर रहे हैं। निजी स्कूलों ने अभिभावकों पर नयी पुस्तकें खरीदने और फिर फीस जमा करने के लिए नोटिस जारी कर दिया है। सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर भी अभिभावकों के द्वारा फीस का विरोध किया जा रहा है। मानव एवं संसाधन विकास मंत्रालय को यह विषय गंभीरता से लेना चाहिए। अगर भविष्य में ऑनलाइन पढ़ाई को शिक्षा का माध्यम बनाते हैं तो देश के हर गांव, शहर, कस्बे को अच्छी स्पीड के इंटरनेट कनेक्टिविटी से जोड़ने की तरफ कदम बढ़ाना होगा और आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण छात्र शिक्षा से वंचित न हो जाय इसके लिए फ्री डाटा देने की तरफ भी काम करना होगा।

Special Report : Ashutosh Singh

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