केरल विधानसभा: वामदल के लिए खतरे की घड़ी, कांग्रेस की स्थिति भी ‘करो या मरो’ जैसी

राजनीति (TV News India): केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे इस बार कई सवालों का जवाब देंगे। मसलन क्या वामदल देश में अपने इकलौते किले को बचा पाएंगे? भाजपा क्या कर पाएगी? पिछले विधानसभा में चुनाव में खाता खोलने में कामयाब रही भाजपा को इस बार बड़ी  सियासी ताकत बनकर उभरने की उम्मीद है। हाल में राज्य में भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति को बल मिला है। साल दर साल सिकुड़ते जनाधार से परेशान कांग्रेस की निगाहें हर पांच साल बाद सत्ता बदलने के ट्रेंड पर टिकी हैं।

नई सदी भारत की राजनीति में वामदलों के लिए बड़ी मुसीबत बन कर आई है। शुरुआत में वाम राजनीति का सबसे मजबूत किला पश्चिम बंगाल ढह गया। बाद में त्रिपुरा में भाजपा के हाथों सत्ता गंवानी पड़ी। केरल के रूप में अब उसके पास इकलौता राज्य बचा है। जाहिरा तौर पर अगर केरल में भी नाकामयाबी हाथ लगी तो वामदलों की देश की राजनीति में प्रासंगिकता खत्म होने पर मुहर लग जाएगी।

दशकों से राज्य की सियासत में मजबूत स्थिति बनाने के लिए संघर्षरत भाजपा की योजना इस चुनाव के जरिए अगले चुनाव की नींव तैयार करने की है। पार्टी वहां हिंदुत्व की राजनीति की पैठ बनाने में  जुटी है। इसी रणनीति के तहत पार्टी ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ मुहिम चलाई।

देश की राजनीति में वामदलों की तरह सिकुड़ती जा रही कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव करो या मरो की स्थिति वाला है। राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी का दखल कम होता जा रहा है तो राज्यों में जीती हुई सत्ता पार्टी संभाल नहीं पा रही। शीर्ष स्तर पर गुटबाजी से परेशान पार्टी की सारी उम्मीदें बस राज्य के बदलाव की परंपरा पर हैं।वामदलों के लिए खतरे की घड़ी