मुस्लिम महिलाओं के न्याय और सम्मान की दिशा में बड़ा कदम, एक कुप्रथा का अंत

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नई दिल्ली (TV  News India): भारत के संसदीय इतिहास में 30 जुलाई, 2019 की तारीख एक अहम पड़ाव के रूप में दर्ज हुई। उच्च सदन में ऐतिहासिक तीन तलाक बिल पारित होने के बाद मुस्लिम महिलाओं के न्याय और सम्मान की दिशा में एक ऐसी सफलता हासिल हुई जिसकी प्रतीक्षा दशकों से थी। विपक्ष के तमाम गतिरोध के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने इसे पूरा करने की दिशा में प्रयास जारी रखे और अंतत: कामयाबी पाई। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून प्रभाव में आ गया है।

सजा का प्रावधान  कोई नई बात नहीं

यह पहली बार नहीं कि किसी सिविल मामले में कानून बना कर उसमें दंड का प्रावधान किया गया हो। अन्य सिविल मामलों में भी दंड का प्रावधान है। उदाहरण के तौर पर दहेज लेने पर कम से कम पांच वर्ष, दहेज मांगने पर छह महीने का कारावास, शादीशुदा रहते हुए दोबारा विवाह करने पर सात वर्ष की सजा और बाल विवाह पर दो वर्ष की सजा का प्रावधान है। ये सभी कानून हिंदू समाज के लिए कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में बने। स्पष्ट है कि तीन तलाक संबंधी कानून में सजा का प्रावधान होना कोई नई बात नहीं है। महिला अधिकारों और जीवन जीने की गरिमा का हनन करने वाले व्यक्ति में दंड का भय होना ही चाहिए, किंतु इस मामले में कांग्रेस का रुख तुष्टीकरण की राजनीति वाला रहा।

पीएम मोदी का नाम सामाजिक सुधारकों की श्रेणी में

तीन तलाक संबंधी कानून बनने के बाद इतिहास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम निश्चित रूप से राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर सरीखे सामाजिक सुधारकों की श्रेणी में रखा जाएगा। तीन तलाक संबंधी कानून मुस्लिम महिलाओं के हितों और अधिकारों की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध होगा। अब उनके लिए एक नए युग का आरंभ होगा और तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति के अंत की शुरुआत होगी।

Posted by:- Ashish  jha

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