औरैया (उत्तर प्रदेश) मामले में 4 साल की बच्ची के यौन शोषण के आरोपी के खिलाफ 20 दिन में चार्जशीट व 9 दिन में अर्थदण्ड सहित आजीवन कारावास की सज़ा ।

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औरैया (उत्तर प्रदेश) की एक विशेष अदालत ने आरोप पत्र दाखिल करने के 9 दिनों के भीतर एक रिकॉर्ड बनाते हुए एक
यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी पोस्को एक्ट, 2012 के तहत सजा का आदेश पारित किया। पुलिस ने अपराध के 20 दिनों के भीतर चार्जशीट भी दाखिल किया था। पिछले महीने,पोस्को एक्ट के मामलों के निपटान में देरी को ध्यान में रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाने के निर्देश दिए थे।

क्या था मामला ?

IPC की धारा 376 और पोक्सो की धारा 5 और 6 के तहत FIR, एक व्यक्ति श्यामवीर (उम्र 19 साल) के खिलाफ 01.08.2019 को दर्ज की गई थी, जिसमें उस पर आरोप था कि उसने अपने घर में 4 साल की बच्ची को फंसा लिया था और उसका उत्पीड़न किया था। प्राथमिकी में खुलासा किया गया कि उसने अपनी अंगुलियों को उसके (बच्ची) निजी अंगों में प्रवेश कराया था, जिसके परिणामस्वरूप बच्ची को गंभीर रक्तस्राव हुआ। पीड़िता ने इस घटना की जानकारी अपनी मां को दी, जिन्होंने बाद में मामले को पीड़ित के पिता को सूचित किया। शिकायत मिलने पर, पुलिस ने आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया और धारा 161 सीआरपीसी के तहत पीड़िता का बयान दर्ज किया। पीड़िता का मेडिकल परीक्षण 02.08.2019 को डॉ. सीमा गुप्ता ने किया था। 20 दिनों के भीतर जांच पूरी करने के बाद, 20.08.19 को “उत्तर प्रदेश राज्य बनाम श्यामवीर” के मामले में विशेष POCSO कोर्ट के समक्ष चार्जशीट दायर किया गया। अदालत ने केवल 8 दिनों में ट्रायल को तेजी से पूरा किया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री. राजेश चौधरी ने 29.08.2019 को सजा का आदेश पारित किया।

अभियुक्त की तरफ से तर्क था की दुश्मनी के कारण उसे फ़साया गया है इसके बाद, अदालत ने कहा कि अभियुक्त ने उसके और शिकायतकर्ता के बीच दुश्मनी के बारे में गवाही देने के लिए कोई गवाह नहीं पेश किया।
अदालत ने डॉ.सीमा गुप्ता सहित सभी गवाहों के बयानों की जांच की जिन्होंने यह पुष्टि की कि चोटों की प्रकृति प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों के समान थी। अदालत की यह राय थी कि घटना के बारे में अपनी मां को सूचित करने का पीड़िता का तुरंत बाद का आचरण, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 8 के तहत प्रासंगिक था। इसको लेकर असम राज्य बनाम रामेन डावराह, (2016) 3 SCC 19 के मामले पर अदालत ने भरोसा किया। सजा के आदेश को पारित करते समय, न्यायालय ने दीपक राय, आदि बनाम बिहार राज्य, (2013) 10 SCC 421 के मामले पर भरोसा किया, जिसमें यह ठहराया गया था कि सजा पारित करने के दौरान अभियुक्त की कम उम्र, सजा को कम करने वाला कारक नहीं हो सकती है।

अदालत ने यह भी नोट किया कि सत्य नारायण तिवारी @ जॉली एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2010) 13 SCC 689, में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “महिलाओं के खिलाफ अपराध, साधारण अपराध नहीं हैं जो गुस्से में या संपत्ति के लिए किए जाते हैं। वे सामाजिक अपराध हैं। वे पूरे सामाजिक ताने-बाने को बाधित करते हैं। इसलिए, वे कठोर दंड को आकर्षित करते हैं।”

पूर्वोक्त सामग्रियों और टिप्पणियों के आधार पर, अदालत ने आरोपी को उक्त प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास और 2,00,000 / – रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।

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